कला कभी किसी की गुलाम नही रही, अगर किसी ने कैद करने की कोशिश की तो “वीर-ज़ारा” सरीखी फिल्मों के जरिए, लोगो तक पहुँची है। लेकिन समझदार के जरिए।

1997 में “म्युजिकली हिट” फ़िल्म “दिल तो पागल है” देने और लंबा ब्रेक लेने के बाद 2004 में यश चोपड़ा ने वापस निर्देशन कुर्सी पर बैठने का ऐलान कर दिया। कि यश चोपड़ा फिर से 70 एमएम के पर्दे पर आपके नजदीकी सिनेमाघरों में मोहब्बत लेकर आ रहे है। यश चोपड़ा ने दिल तो पागल है, ही फ़िल्म का फार्मूला रखते हुए, दो अभिनेत्रियों के साथ एक अभिनेता को फ़िल्म के लिए चुना। अभिनेत्रियां रानी मुखर्जी, और प्रीति जिंटा जबकि अभिनेता शाहरुख खान, जो यश राज के पसंदीदा बन चुके थे। खैर,

फ़िल्म की कहानी आदित्य चोपड़ा की कलम से निकली। (दिल तो पागल है, फ़िल्म का संगीत बहुत हिट हुआ था, इसका संगीत उत्तम सिंह ने दिया था। वैसे यश चोपड़ा की हर फिल्म का संगीत अच्छा होता है। यश चोपड़ा की बड़ी फिल्मों में शिव-हरि, उत्तम सिंह, RD बर्मन, रहे है।) जब इस फ़िल्म के संगीत की बात आई, तो दिल तो पागल है के संगीत से ऊपर ही होना चाहिए। इसलिए इस नई फ़िल्म संगीत के लिए विचार-विमर्श चल रहा था।

उस दौरान यश राज फिल्म्स के सीईओ संजीव कोहली, ने यश चोपड़ा और आदित्य चोपड़ा को उनके पिता द्वारा बनाई कुछ धुनें सुझाई, जो उनके पास रखी हुई थी। करीब 100 अनछुई धुनें बनी रखी हुई थी। कोहली ने इनमें से 35 अच्छी धुनें, आदित्य को सुनने के लिए दी। और कहा कि अगर इस फ़िल्म के मूड के हिसाब से ये धुन फिट हो जाए, तो देख लीजिए। आदित्य चोपड़ा ने 35 धुन में से बेस्ट/उत्तम 11 धुन फ़िल्म के लिए पसंद की। जब धुन पसंद कर ली। तो संजीव कोहली ने इन धुनों को फ़िल्म के लिए फाइनल टच देकर तैयार किया। फ़िल्म के गीतकार के लिए जावेद अख़्तर को लिया गया। (यश राज के लिए ज्यादातर गीत आनंद बक्शी ने ही लिखे थे। अपनी कलम का जादू यश राज की फिल्मों में बिखेरा, 2002 में आनंद बक्शी दुनिया से विदा हो गए)। फ़िल्म के लिए जावेद अख्तर ने गीत के बोल इन्ही धुनों पर लिखे।

आदित्य चोपड़ा और यश चोपड़ा ने महान संगीतकार की धुनों के लिए गायक/गायिकाओं के चुनाव में काफी सावधानी बरतते हुए, और उत्तम चुनाव किया। हालांकि यशराज गायकों के चयन में हमेशा सावधानी बरतते आए है। जिससे धुनों के साथ पूरा न्याय हो सके।…. स्वर साम्राज्ञी लता मंगेश्कर, जगजीत सिंह, सोनू निगम, रूप कुमार राठौड़, उदित नारायण, गुरदास मान, अहमद हुसैन, मोहम्मद हुसैन, मोहम्मद वकील। इस फ़िल्म के संगीत के साथ इन कलाकारों ने अपना सर्वश्रेष्ठ दिया। क्योंकि संगीत महान जादूगर का था।

इस फ़िल्म का संगीत काफी सफल हुआ था, 2004 की उत्तम और बड़ी हिट एल्बम में शुमार रही थी। इस फ़िल्म के गानों की ओरिजिनल धुनें और बैक ग्राउंड म्यूजिक मार्केट में रिलीज किया गया था। जो कुछ ही भारतीय फिल्मों का हुआ था।

महान संगीतकार की अनछुई ये धुनें सबके दिल को छू गई।
दो पल रुका, तेरे लिए, तुम पास आ रहे हो, लोड़ी, ऐसा देश है मेरा….सब एक से एक धुनें और लाजबाब बोलो से सजी हुई थी। 2004 में इस संगीत ने 1960-70 के मधुर संगीत की यादें ताज़ा कर दी।

इन सुरीली धुनों के मालिक महान संगीतकार स्व. मदन मोहन कोहली साहब थे। (कला क्या होती है, इसका बेहतरीन नमूना मदन मोहन कोहली साहब ने 2004 में पेश किया। जो 1975 में इस दुनिया से विदा हो गए थे। 29 साल बाद उनकी अनछुई धुनें जब उनके बेटे ने रिलीज की तो तुरंत प्रभाव से लोगो के दिलों को छूकर दिल मे उतर गई। जब उन्होंने खुद संगीत दिया था, तब एक से एक नायाब कालजयी नगमे दिए। जो लोगो के दिलो में आज भी ताज़ा है। कोहली साहब ने अपने बेटे के लिए अपनी वसीयत में नायाब सुरीली जायदाद लिख दी। और एक शर्त जायदाद में जोड़ दी। वसीयत लिखने वाले को कह दिया। कि जब मेरा बेटा इन धुनों के लायक हो जाए, तभी वह इनका असली वारिस/हकदार बने। चाहे मेरी वसीयत बिन वारिस ही रहे, कोई गम नही। इस वसीयत की समझ के बाद ही….शर्त के मुताबिक यह धुनें 29 साल बाद बेटे सुनील कोहली के नाम हुई। जब उनको “वीर-ज़ारा” के लिए, इन धुनों की समझ के काबिल खुद को कर लिया था। कला के धनी कारीगरों के यहाँ इस तरह की कारीगरी आम बात है।

लता मंगेशकर जी ने अपनी गायकी जीवन का सर्वोत्तम गायन मदनमोहन के संगीत में स्वरबद्ध किया है। लताजी-मदनजी का संग-साथ जब भी चित्रपट गीतों को मिला है, तब पूरा संगीत एक रूहानी दुनिया में तब्दील सा हो जाता है। हम इस पत्थर के संसार में कुछ मुलायम हो जाते हैं और कविता और संगीत की सच्चाई हमारे संसारी मन पर तारी हो जाती है। जब जब भी लताजी-मदन जी ग़ज़ल को रचते हैं लगता है दुनिया के ये दो बेजोड़ कारीगर किसी तपस्या से इस रचना को शक़्ल दे लाए है। मदन मोहन के संगीत में गाते हुए लता जी का इमोशन स्तर शीर्ष पर रहता था।

जिस प्रकार शरीर मर जाता है, लेकिन आत्मा अमर होती है। ठीक वैसे ही कला भी आत्मा के समान अमर है। कला कभी किसी की गुलाम नही रही, अगर किसी ने कैद करने की कोशिश की तो “वीर-ज़ारा” सरीखी फिल्मों के जरिए, लोगो तक पहुँची है। लेकिन समझदार के जरिए।

“दो पल रुका धुनों का कारवां, फिर चला आया”

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