“तौहीन बाग महज संयोग नही है, बल्कि देश का सौहार्द बिगाड़ने का प्रयोग है”।

फंतासी और साइंस फिक्शन

हॉलीवुड में ज्यादातर फिल्मों का निर्माण फंतासी और साई-फाई में होता है।

फंतासी और साई-फाई:-

वास्तव में फंतासी विज्ञान की तुलना में साहित्य की सबसे पुरानी शैली है। अपने तर्को के साथ जिसमे जनरल सुपर नेचुरल और जादुई घटनाओं से संबंधित है,जिनका विज्ञान की नज़र में कोई आधार नहीं है। यदि हम मानव सभ्यता की सबसे पुरानी जीवित कहानियों को देखते हैं, जैसे कि महाभारत, रामायण, महाकाव्य या प्राचीन की हमें देवताओं, राक्षसों और जादू की कहानियां मिलती हैं। (जो पूर्व में घटित हो चुकी है, पौराणिक कथाएं, आदि)

साइंस फिक्शन पिछली शताब्दी की अपेक्षाकृत हाल ही की शैली है, इसकी उत्पत्ति कुछ सौ साल पहले की है।

विज्ञान कहानियां उन घटनाक्रम और तकनीक से संबंधित होती हैं, जो विज्ञान के आधार पर संभव हो सकती हैं। कुछ विज्ञान कहानियां जैसे कि भविष्य के अंतरिक्ष ओपेरा या समय की यात्रा की कहानियां हो सकती हैं, लेकिन वे अभी भी वैज्ञानिक सिद्धांत के दायरे से बाहर नहीं आई हैं। (चांद पर घर बनना, जीवन यापन शुरू करना, सरकार बनाकर लोकतंत्र स्थापित करना)

विज्ञान का कंटेंट और फंतासी दोनों के लिए नियमों की आवश्यकता होती है। और इनके नियम-कायदे लेखक गढ़ते हैं।

इनको बेहतर समझने के लिए……

हैरी पॉटर vs रियल स्टील

हैरी पॉटर (2001)में लेखक की कहानी का मूल भाव पूर्व में घटित होने वाली कहानियों/घटनाओं को लेकर था, कि ऐसी जादुई दुनिया रही है। बिल्कुल इस दुनिया की तरह, बस उसके नियम/कायदे अलग है, इस दुनिया की तुलना में।

रियल स्टील (2011) में लेखक की कहानी का मूल भाव भविष्य में घटित होने वाली कहानियों/घटनाओं को लेकर है। 1949 में लेखक ने अपने भाव 2020 के लिए जाहिर किए है। लेखक ने अपने भाव जाहिर करने के बाद उनको कलमबद्ध किया। तब इंसानी पहलवान अखाड़े में कुश्ती लड़ते थे। जबकि 2020 में लेखक ने रोबोट को अखाड़े में लड़ते देखा। क्योंकि जिस गति से विज्ञान चल रही है, तो यह संभव घटित घटना प्रतीत हो रहीं है। वैसे जापान, चीन आदि देश इन घटनाओं को अंजाम देने पर काम कर रहे है। वह दिन दूर नही जब रोबोट भी कुश्ती करते नज़र आएंगे। अभी टीवी गेम में यह संभव हो सका है।

दोनों स्थिति में लेखक के भाव घटित घटनाओं को लेकर व्यक्त किये गए है। कुछ लेखक नियमो के साथ बहुत प्रभावी कहानी कह जाते है।

मुझे साई-फाई में सिम्पल तकनीक वाली फिल्म अच्छी लगती है। अवतार, रियल स्टील, अवेंजर्स I, आदि। ज्यादा साई-फाई हज़म नही होती है, पेसिफिक रिम, और भी कई भयानक फिल्में है।

हालांकि भविष्य इन्ही कहानियों के जरिए कहा जाना है।

[ वैसे हमने (भारत) तो दुनिया को विज्ञान का रील लाइफ में दस साल का डेमो दिया है। इससे पहले भारत ने जीरो दिया था]

कल एक फ़िल्म के बारे बात चल रही थी। काफी मस्त फ़िल्म थी। इस फ़िल्म की याद आने पर….

मेरे मन मे यूं ही कुछ सीन क्रिएट हुआ…..जो आजकल अक्सर हो रहा है। और आप लोग पढ़ भी रहे है।

फ़िल्म पर बात हो रही थी। तो फ़िल्म थी।

श्वान लेवी द्वारा निर्देशित, बेन स्टिलर अभिनीत

“नाईट एट द म्यूजियम”

फ़िल्म की कहानी लेरी (लॉरेन्स) डाले के इर्दगिर्द है। जो अनचाहे मन से, बेरोजगारी में म्यूजियम में सेक्युरिटी गार्ड की जॉब जॉइन करता है। रात की ड्यूटी मिलती है।

लेरी के जॉइन करने के बाद कुछ दिनों में म्यूजियम के अंदर बेजान पड़े पुतलों में अचानक जान आ जाती है। और वो सारे पुतले उत्पात मचाने लगते है। यह देखकर लेरी चौक जाता है। सुबह होते ही वापस बेजान हो जाते है। यह सिलसिला चलता रहता है।
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अब मेरे दिमाग का सीन….

सन 2014 से पहले बहुत कम लोग राजनीति में दिलचस्पी रखते थे। वोटिंग किसे करनी है। वो फिक्स रहता था। लेकिन अभी जितनी चिल्ल पौ नही थी।

लेकिन मोदी जी के दिल्ली आने और देश का चौकीदार बनने के बाद, काफी लोगों में राजनीति के प्रति दिलचस्पी बढ़ी। खैर,

देश की बागडोर चौकीदार मोदी जी के हाथ मे आने के बाद, जो लोग देश के खिलाफ पुतला बनकर अपना काम शांति से कर रहे थे। उन लोगों में हलचल होनी शुरू हो गई। और देश की जनता के सामने चिन्हित होने लग गए।
लेकिन सीएए आने के बाद हालात बिल्कुल फ़िल्म “नाईट एट द म्यूजियम” सरीखे हो गए है। सारे डेडली पुतले, जो गुप्त तौर पर देश विरोधी सोच रखते थे। और देश को शांतिदूत राष्ट्र बनाने के काम पर लगे हुए थे। लोगों की नजरों से दूर। उनमें जान आ गई। और खुलकर देश के सामने आ गए। क्योंकि पहले, तो म्यूजियम में सब एक समान थे। इतनी बैलेंसिंग बनाकर रखी हुई थी। इससे किसी को भनक न थी। क्या चल रहा है। बोले तो गंगा जमुनी तहजीब। लेकिन सीएए के बाद तो, साफ तौर पर फ़िल्म “नाईट एट द म्यूजियम” का ऑफिसियल रीमेक बनाने का ऐलान कर दिया। और इस रीमेक को नाम दिया है।

“नाईट एंड डे एट द तौहीन बाग”

इस रीमेक की टैग लाइन आज मोई जी ने बताई है।

“तौहीन बाग महज संयोग नही है, बल्कि देश का सौहार्द बिगाड़ने का प्रयोग है”।

बाकई इस रीमेक में सारी चीज़ों का ध्यान दिया गया है।

ड्रामा, रोमांस, एक्शन, रिवेंज, गुस्सा….खासतौर पर हॉरर इवेंट “डरना जरूरी है” भी डाला गया है। जबकि असल मे सीएए की थीम है “डरना मना है” लेकिन रीमेक के लिए उन्हें डिफरेंट थीम चईये थी।

फुल ऑन एयर ऑन।

इस तरह यह रिमेक फ़िल्म दिल्ली के नजदीकी सिनेमाघर में रिलीज है। जो हाउस फुल चल रेली है।

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